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पंजाब की सियासत में नए समीकरणों की तैयारी, अकाली दल-भाजपा के फिर साथ आने के आसार

Akali Dal and BJP may reunite in Punjab; speculation intensifies regarding an announcement of the alliance after Diwali.

दिवाली के बाद गठबंधन को लेकर तस्वीर साफ होने की चर्चा, सीटों के बंटवारे पर फंसेगा पेंच; 2027 के विधानसभा चुनाव में AAP और कांग्रेस के सामने बन सकता है नया मोर्चा

सेंटर न्यूज एक्सप्रेस। देसराज भुट्टा

जालंधर। पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। इस बीच शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के बीच दोबारा गठबंधन होने की संभावनाओं ने प्रदेश की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दोनों दल दिवाली के बाद अपने चुनावी गठबंधन को लेकर कोई बड़ा ऐलान कर सकते हैं। हालांकि, अभी तक दोनों पार्टियों की ओर से गठबंधन पर आधिकारिक मुहर नहीं लगाई गई है। ऐसे में फिलहाल इसे संभावित राजनीतिक समझौते के तौर पर ही देखा जा रहा है।

भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की ओर से पंजाब में एनडीए सरकार बनाने की बात कहे जाने के बाद इन अटकलों को और बल मिला है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से राज्य में चुनावी संभावनाओं और संगठन की स्थिति का आकलन किया जा रहा है। वहीं अकाली दल भी आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार कर रहा है। दोनों दलों के बीच बातचीत आगे बढ़ती है तो इसका असर पंजाब के चुनावी मुकाबले पर पड़ सकता है।

45 से 50 सीटों पर भाजपा की नजर, अकाली दल के सामने सीटों का सवाल

गठबंधन की चर्चा के बीच सीटों के बंटवारे को सबसे अहम मुद्दा माना जा रहा है। राजनीतिक रिपोर्टों के मुताबिक भाजपा पंजाब में करीब 45 से 50 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग कर सकती है। हालांकि, भाजपा की प्रदेश इकाई सार्वजनिक रूप से सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कह चुकी है। ऐसे में गठबंधन होने की स्थिति में सीटों का अंतिम फॉर्मूला क्या होगा, यह बातचीत का बड़ा विषय रहेगा।

अकाली दल लंबे समय तक पंजाब की राजनीति में भाजपा का बड़ा सहयोगी रहा है। ऐसे में पार्टी के लिए सीटों के बंटवारे में अपनी पुरानी राजनीतिक हैसियत और ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद आधार को ध्यान में रखना जरूरी होगा। दूसरी तरफ भाजपा भी अब पहले के मुकाबले अधिक सीटों पर अपनी राजनीतिक ताकत आजमाना चाहती है। यही वजह है कि संभावित गठबंधन में दोनों दलों के बीच सीटों का अनुपात आसानी से तय होना जरूरी नहीं है।

1997 से 2020 तक साथ रहे दोनों दल

अकाली दल और भाजपा का गठबंधन पंजाब की राजनीति में करीब 23 साल तक प्रभावशाली रहा। वर्ष 1997 के विधानसभा चुनाव के बाद दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाई थी। इसके बाद कई चुनावों में दोनों पार्टियां एक साथ मैदान में उतरीं। अकाली दल को ग्रामीण और सिख मतदाताओं के बीच समर्थन मिलता रहा, जबकि भाजपा का प्रभाव मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों और व्यापारिक वर्ग में माना जाता था। दोनों दलों का यह सामाजिक और राजनीतिक आधार गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत रहा।

वर्ष 2007 और 2012 में गठबंधन ने विधानसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाई। हालांकि, कृषि कानूनों को लेकर वर्ष 2020 में दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था। हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद से दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ती रही हैं।

2022 के चुनाव में अकाली दल और भाजपा को लगा था झटका

2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतकर पंजाब की सत्ता हासिल की थी। कांग्रेस को 18, अकाली दल को 3 और भाजपा को 2 सीटें मिली थीं। वोट प्रतिशत के लिहाज से भी अकाली दल और भाजपा दोनों को नुकसान उठाना पड़ा था। अकाली दल को करीब 18.38 प्रतिशत और भाजपा को 6.60 प्रतिशत वोट मिले थे।

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर कुछ बदली। भाजपा ने पंजाब में अपना वोट प्रतिशत बढ़ाकर 18.56 प्रतिशत कर लिया, जबकि अकाली दल को करीब 13.41 प्रतिशत वोट मिले। दोनों का संयुक्त वोट प्रतिशत करीब 31.97 रहा। इसी चुनाव में कांग्रेस को 26.31 प्रतिशत और आम आदमी पार्टी को 26.03 प्रतिशत वोट मिले थे। इन आंकड़ों ने दोनों दलों के लिए दोबारा साथ आने की राजनीतिक संभावना को महत्वपूर्ण बना दिया है।

गठबंधन से AAP और कांग्रेस की चुनौती बढ़ सकती है

यदि अकाली दल और भाजपा एक साथ चुनाव लड़ते हैं तो पंजाब में मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। दोनों पार्टियों का पारंपरिक वोट आधार अलग-अलग क्षेत्रों में रहा है। भाजपा का शहरी क्षेत्रों में प्रभाव और अकाली दल की ग्रामीण इलाकों में पकड़ एक-दूसरे को मजबूती दे सकती है। इससे आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के सामने चुनौती बढ़ने की संभावना है।

हालांकि, लोकसभा चुनाव के वोट प्रतिशत को विधानसभा चुनाव में सीधे लागू नहीं किया जा सकता। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे, उम्मीदवार और मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग होती हैं। गठबंधन होने पर दोनों दलों के समर्थक एक-दूसरे के उम्मीदवारों को कितना वोट देते हैं, यह भी चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाएगा।

किसान आंदोलन के बाद भरोसा बहाल करना बड़ी चुनौती

दोनों दलों के दोबारा साथ आने की राह आसान नहीं मानी जा रही। कृषि कानूनों के विरोध में हुए आंदोलन के दौरान भाजपा के प्रति पंजाब के किसानों में नाराजगी सामने आई थी। अकाली दल ने भी इसी मुद्दे पर गठबंधन तोड़ा था। ऐसे में यदि दोनों पार्टियां फिर साथ आती हैं तो उन्हें किसानों और ग्रामीण मतदाताओं के बीच भरोसा कायम करने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा अकाली दल को अपने पुराने राजनीतिक आधार को मजबूत करना होगा। पार्टी के सामने बेअदबी के मामलों, किसान मुद्दों, नशे और कानून-व्यवस्था जैसे विषयों पर जनता के सवालों का जवाब देने की चुनौती भी रहेगी। भाजपा के लिए भी पंजाब में अपने संगठन का विस्तार और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वीकार्यता बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।

अकाली दल के दूसरे धड़े को लेकर भी चर्चा

गठबंधन की संभावित बातचीत में अकाली दल के दूसरे धड़े को साथ रखने का मुद्दा भी चर्चा में बताया जा रहा है। सीटों के बंटवारे में इस धड़े को जगह देने या उसके उम्मीदवारों को समायोजित करने पर भी राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में अभी कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।

गठबंधन हुआ तो चुनावी मुद्दों पर भी बनेगी साझा रणनीति

2027 के विधानसभा चुनाव में किसान संकट, युवाओं के लिए रोजगार, नशा, उद्योग, कानून-व्यवस्था, धार्मिक मामलों और राज्य की आर्थिक स्थिति जैसे मुद्दे अहम रह सकते हैं। अकाली दल और भाजपा के एक साथ आने की स्थिति में दोनों दलों को इन मुद्दों पर साझा चुनावी एजेंडा तैयार करना होगा। साथ ही मुख्यमंत्री पद, उम्मीदवारों के चयन और प्रचार अभियान को लेकर भी सहमति बनानी होगी।

फिलहाल गठबंधन की चर्चा ने पंजाब की राजनीति में नई संभावनाएं जरूर पैदा कर दी हैं, लेकिन अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की बातचीत और सीटों के बंटवारे पर निर्भर करेगा। दिवाली के बाद इस संबंध में तस्वीर साफ होने की संभावना जताई जा रही है। तब तक भाजपा और अकाली दल के दोबारा साथ आने की चर्चा प्रदेश की राजनीति का बड़ा विषय बनी रहेगी।

SourceCNE NEWS
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